
आनंदमयी गंगोत्री !
कहीं अलकनंदा, कहीं मन्दाकिनी, कहीं भागीरथी...
नाम भिन्न भिन्न आस्था एक, श्रद्धा एक,
इस तट से उस तट तक जल ही जल...
प्रवाह ही प्रवाह दिन-रात लगातार,
चलते चलते समां जाती गंगा सागर में...
समर्पण की अंतिम परिणिति
गति कों मिल गया विश्राम!
हर लहर में अब केवल आनंद ही आनंद बंधु...
ठीक उसी तरह ढूंड लिया मैंने भी,
सत्य का अखंड स्रोत अपने भीतर,
अटलता का गहन तोष सार्थक हुआ जन्म जन्मंतेर का प्रयास
सूर्य उदय हुआ भीतर अजस्र उत्ताप...
पिघलने लगा शिल्याव्रित हिम का अहम्
दर्प की पथरीली परतों कों फोड़,
बहने लगा प्रेम का झरना गोमुख से....ह्रदय बन गया तीर्थस्थल''
आनंदमयी गंगोत्री ! हुई अवतरित..!
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